हिन्दी हाइकु(HINDI HAIKU)-'हाइकु कविताओं की वेब पत्रिका'-2010 से प्रकाशित हो रही है। आपकी हाइकु कविताओं का स्वागत है !

1790

1790

डॉ0 सुरंगमा यादव 1 गौरव गाथा सहस्र मुख गाता देश महान 2 आजादी आई झूमे धरा गगन रखो सँभाल 3 वीरों की जान लहराये तिरंगा सदा सर्वदा 4 श्रद्धा सुमन अर्पित उन्हें, जो मिटे देश के लिए । .0. डॉ0 सुरंगमा यादव ,असि0 प्रो0 हिन्दी,महामाया राजकीय महाविद्यालय महोना, लखनऊ

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1789

1789

1- डॉ.जेन्नी शबनम 1 मन है क़ैदी, कैसी आज़ादी पाई? नहीं है भायी! 2 मन ग़ुलाम सर्वत्र कोहराम, देश आज़ाद! 3 मरता बच्चा मज़दूर किसान, कैसी आज़ादी? 4 हूक उठती, अपने ही देश में हम ग़ुलाम! -0- 2- डॉ.पूर्णिमा राय 1 वक्त ने कहा मिल गई आज़ादी गुलाम मन!! 2 दे पे झूले भारत के […]

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1788

1788

सभी भाई बहनों को हिन्दी हाइकु की तर से अनगिन शुभकामनाएँ! डॉ हरदीप सन्धु और रामेश्वर काम्बोज -0- राखी के हाइकु 1-डॉ  जेन्नी शबनम 1 हो गए दूर संबंध अनमोल बिके जो मोल।  2 रक्षा का वादा याद दिलाए राखी बहन-भाई।  3 नाता पक्का सा भाई की कलाई में सूत कच्चा सा।  4 पवित्र धागा […]

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1787

1787

स्वर्गीय राधेश्याम  का वर्षा विषयक लेख वर्षा के द्वारे स्वर्गीय राधेश्याम  के अंग्रेज़ी हाइकु की समीक्षा ताजमहल की समीक्षा    

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1786

1786

शशि पाधा 1 निर्मल मन पावन प्रतिबिम्ब स्फटिक शिला | 2 भ्रम में रखें पर्वत श्रृंखलाएँ शिखर दूर | 3 मोह जंजाल सुलझाए सद्गुरू हो चिरानन्द | 4 ज्ञान पिटारी अनछुई निधियाँ खोलो, तो पाओ | 5 मन की गुहा सुख दुःख बसेरा जो माँगो, तेरा | 6 रखी ओसारे सुधियों की ओढ़नी ओढूँ, सहेजूँ […]

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1785

1785

1-डॉ.सुरंगमा यादव 1       फिर ना मिले अनमोल जीवन गिरी बूँद- सा । 2       विजय -गाथा भुजबल के बल रचते वीर । 3 सत्य का पथ मंजिल सुनिश्चित चल निशंक! 4  हठीला तम छिपा दीपक तले षड्यन्त्रकारी 5  उदर भरा पर भूख अशांत लोलुप मन -0- डॉ.सुरंगमा यादव असि0 प्रो0 हिन्दी,महामाया राजकीय महाविद्यालय महोना,लखनऊ  – उ0प्र0 […]

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1784

1784

1-रचना श्रीवास्तव 1 शब्द रहित भाव निहित होता पिता का त्याग 2 पिता की बोली अनुशासन -भरी प्रेम- गागर 3 बादल पिता चुपके से ढक ले दर्द का सूर्य -0- 2-मंजूषा मन 1 मिले ही नहीं बिछड़े सौ- सौ बार कैसा ये प्यार ! 2 भूलें किसकी जो मान ले अपनी, बस उसकी। 3 छत […]

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1783

1783

1-कृष्णा वर्मा 1 वर्षा का ज़ोर भिगोया हवाओं का लो पोर-पोर। 2 मेघों की अदा मनवा की बिजुरी देते चमका। 3 किसने बोई प्रेम धुन भीतर दीखे ना कोई। 4 सावन रस झरती जब बूँदें मन बेबस। 5 बाँकी है रुत बाँचे प्रेम कथाएं भीगी बेसुध। 6 छिटके मेह खिल-खिल महके फूलों की देह। 7 […]

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1782

1782

1-डॉ जेन्नी शबनम 1 दोषी है कौन ? धरा बनी अलाव, हमारा कर्म।  2 आग उगल रवि गर्व से बोला –  सब झुलसो।  3 रोते थे वृक्ष – ‘मत काटो हमको’, अब भुगतो।  4 ये पेड़ हरे साँसों के रखवाले मत काटो रे ! 5. बदली सोचे– आँखों में आँसू नहीं बरसूँ कैसे? 6 बिन […]

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1781

1781

1-सुभाष चंद्र लखेड़ा 1 बादल पिया   धरा का तुम बिन  न लागे जिया।  2 धरती प्यासी  बरसो झमाझम   मिटे उदासी।   3 गोरे या काले  जैसे भी हों बादल   हों पानी वाले।  4 हो हरियाली  धरती मतवाली  झूम उठेगी। 5 बरसो खूब  तभी मेरे अंगना  खिलेगी दूब।   -0- 2-विभा रश्मि  1 […]

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1780

1780

ईद का चाँद रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ 1 मटक लिया खुशबू से सिंचित। पूरा वसन्त।                         2 आँखों से पिया रुपहला वसन्त मन न भरा।                        3 ले लूँ बलाएँ सारी की सारी जो भी द्वारे पे आएँ। 4 ठिठका चाँद झाँका जो खिड़की से दूजा भी चाँद। 5 होगी जो भोर और भी निखरेगा मेरा ये चाँद। […]

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1779

1779

शकुन्तला पालीवाल 1 अक्स प्रभु का छिपा माँ के अंदर सम्मान करो। 2 भीगी पलकें कभी न रहे माँ की, रहे खुश वो। 3 जीवन मेरा कभी लगे पहेली कभी सहेली। 4 जीत उसकी थपेड़ों में टिका जो आगे बढ़ा वो । 5 अनकही हैं सैंकड़ों बातें ऐसी अब कहूँ वो । 6 ये लगे […]

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1778

1778

1–फ़ौजी –किसान-डॉ. जेन्नी शबनम  1. कर्म पे डटा कभी नही थकता फ़ौजी किसान।  2. किसान हारे ख़ुदकुशी करते, बेबस सारे।  3. सत्ता बेशर्म राजनीति करती, मरे किसान।  4. बिकता मोल पसीना अनमोल, भूखा किसान।  5. कोई न सुने किससे कहे हाल डरे किसान।  6. भूखा– लाचार उपजाता अनाज न्यारा किसान।  7.  माटी का  पूत माटी […]

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1777

1777

1-प्रियंका गुप्ता 1 सूखी धरती दहकता गगन तेरे ही कर्म ।  2 मन जो तपे प्रेम के छींटे मार भीग जाएगा ।  3 नारी का मन तूने जाना ही नहीं रहा अज्ञानी ।  4 मिला न प्रेम खोजते उम्र झरी कस्तूरी बनी ।  5 उँगली थाम चलना था सिखाया भूला वो अब ।  -0- 2-पुष्पा […]

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1776

1776

भावना सक्सैना 1 उगले आग रोष में है प्रकृति मानव जाग। 2 मेघ -सा छाया धरती पे कुहासा सँभल ज़रा सा। 3 यह क्या किया? सूखे नदी- जंगल दहकी धरा। 4 रोपे न वृक्ष बिगड़ा संतुलन घुटा है दम। 5 जल क्यों व्यर्थ हर बूंद लिए है अपना अर्थ। 

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1775

1775

1-रमेश कुमार सोनी 1 प्रकृति रूप ऋतु वेश संवारें जीवन न्यारे  । 2 वट की लटें धरा छूने निकले बच्चों के झूले । 3 जंगल घने चुनौती देते खड़े घुसो तो जानें । 4 वन की भाषा पशु – पक्षी बोलते हम ही भूले । 5 गाँव निगले कंक्रीट– अजगर बने शहर -0-बसना , छत्तीसगढ़ […]

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1774

1774

1-विभा रश्मि 1 बरखा बूँदें  गुदगुदातीं मन  ग़ज़ब फ़न । 2 लय ताल से  रिमझिम बरसीं हरस मन। 3 पंख झाड़ता  बाल्कोनी में परिन्दा  बैठा  अल्गनी । 4 नन्ही ने देखी   बरसात पहली, बूँदों से खेली ।  5  नीड़ों में बैठे   चूज़े रूठे ठुनके   भीगे माँ संग । 6 रेत ने पी ली  ओक […]

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1773

1773

भावना सक्सैना 1 भीग जो आई सुबह सुनहरी हर्षा गगन। 2 बरखा बूँदें लाई नवजीवन शांत तपन। 3 दो बूँद जल उठी सौंधी महक थी तप्त धरा। 4 खोह से खींच  लाई बरखा रानी आँखों में पानी। 5 रूह में बसी यादें कुछ पुरानी जिंदा कहानी। 6 दिल के जख्म अपनों की निशानी प्रीत निभानी। […]

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1772

1772

विभा रश्मि  1 दोपहरिया – चुभती लू की फाँसें सुलगी साँसें। 2 ग्रीष्म नौतपा  उमसा चप्पा – चप्पा  तड़की धरा ।  3 गर्मी राक्षसी जिह्वा लपलपाती ज्वाला उगले । 4 नद मुहाने   कटे हैं वन घने  थार  बनेंगे । 5  झेलता वार   करुण है चीत्कार   मौनी पादप ।  6 अकाल – छाया मनु व्यस्त […]

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1771

1771

1- सत्या शर्मा ‘ कीर्ति ‘ 1 गुज़रे पल उग आती झुर्रियाँ उम्र डाली पे  । 2 दौड़ता अश्व जीवन पथ पर मन सारथी । 3 पूछते बच्चे– आँगन औ तुलसी मिलते कहाँ ? 4 दिन गौरैया चुगती जाती दानें उम्र– खेत के । 5 नए सृजन रचे परमेश्वर धरा चाक पे । 6 हमारा […]

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