श्री प्रशान्त - उद्गार मौन के

रोशनी वही जो दृष्टि दे

रोशनी वही जो दृष्टि दे

वो रोशनी किसी काम की नहीं, जो दावा तो करे होने का, पर जिससे किसी को देखने में मदद ना मिलती हो। आप अपनेआप को रोशनी कहने के हक़दार सिर्फ तब हैं, जब आपके कारण, जो आपके सम्पर्क में आये, उसकी दृष्टि खुल जाए। इस ट्यूब लाइट की क़ीमत तभी है ना, जब ये जले […]

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आपके बच्चे आपकी सुनते क्यों नहीं?

आपके बच्चे आपकी सुनते क्यों नहीं?

वो रोशनी किसी काम की नहीं, जो दावा तो करे होने का, पर जिससे किसी को देखने में मदद ना मिलती हो। आप अपनेआप को रोशनी कहने के हक़दार सिर्फ तब हैं, जब आपके कारण, जो आपके सम्पर्क में आये, उसकी दृष्टि खुल जाए। इस ट्यूब लाइट की क़ीमत तभी है ना, जब ये जले तो मुझे दिखाई दे। आप अगर अपने बच्चों के पास हैं लेकिन आपकी उपस्थिति की वजह से आपके बच्चे देखने में मदद नहीं पा रहे, तो आप अभी प्रकाशवान नहीं हैं। आप अभी स्वयं ही प्रकाश नहीं हैं, तो आप अँधेरे से कैसे लड़ेंगे? तो ये मत कहिये कि कई बार रोशनी अँधेरे से हार जाती है। ये कहिये कि अभी हमारी ही रोशनी प्रज्ज्वलित नहीं हुई है।
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कौन सा सवाल कीमती है?

कौन सा सवाल कीमती है?

अहंकार जो कुछ भी करता है, अपने पोषण के लिए ही करता है। जब जानने में तुम्हारी आत्म छवि को ही खतरा हो, तब जानना अहंकार नहीं है। तब जानने की कोशिश अहंकार नहीं है। तब वो प्रेरणा कहीं और से आ रही है। अभी हम थोड़ी देर पहले सवालों की बात कर रहे थे। […]

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आदतें स्वभाव नहीं होती

आदतें स्वभाव नहीं होती

अहंकार जो कुछ भी करता है, अपने पोषण के लिए ही करता है। जब जानने में तुम्हारी आत्म छवि को ही खतरा हो, तब जानना अहंकार नहीं है। तब जानने की कोशिश अहंकार नहीं है। तब वो प्रेरणा कहीं और से आ रही है। अभी हम थोड़ी देर पहले सवालों की बात कर रहे थे। तुम यूँ ही मज़े में बैठे रहकर, अपने आराम में स्थापित रहकर कोई प्रश्न पूछ दो, वो प्रश्न मात्र एक बौद्धिक खुजली है। उसकी कोई कीमत नहीं। एक सवाल वो भी होता है लेकिन जिसको पूछते हुए जबान कांपती है और शरीर थरथराता है क्योंकि इस सवाल का जवाब तुम्हारी जड़ों को हिला सकता है। इस सवाल की कीमत है।
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संसार के बीचोंबीच संसार से मुक्त

संसार के बीचोंबीच संसार से मुक्त

आपके गले में खराश हो, आप किसी ऐसे को समझा के बता दीजिये, जिसके गले में कभी खराश ना हुई हो। आप जितने शब्दों का प्रयोग करना चाहें, आप पूरा ग्रन्थ लिख कर के उसे समझा दीजिये, तो भी आप नहीं समझा सकते। तो ये नापसंदगी की बात नहीं है कि, ‘’मुझे गले की खराश नापसंद है। ये बात ये है, कि मैं जानता ही नहीं। मेरे भीतर वो ताक़त ही नहीं है कि मैं गले की खराश की बात कर पाऊँ। इसलिए मैंने कहा था, स्वास्थ्य कुछ विशेष ताक़त नहीं है। स्वास्थ्य तो, निर्विशेष हो जाना है। बीमारी और ग़ुलामी में कुछ विशेष होता है। मुझे पता ही नहीं है, तुम क्या बातें कर रहे हो।
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आत्मा कहाँ है?

आत्मा कहाँ है?

दिक्कत क्या हुई है कि दुनिया के सारे धर्म-ग्रन्थ ऐसे लोगों के हाथों में पड़ गए है, जो उनको पढ़ने के अधिकारी ही नहीं थे। उन्होंने उनको न सिर्फ पढ़ा है बल्कि उन पर भाष्य भी लिख दिए हैं। और ये भी दावा कर दिया है कि, ‘’हम विशेषज्ञ हैं, हमसे पूछो कि इनका अर्थ क्या है।’’ तो ज़बरदस्त अनर्थ हुए हैं। हर धर्म में ज़बरदस्त अनर्थ हुए हैं! एक-एक पंक्ति, नाश उसका लगा दिया गया है। बात वो कुछ और इशारा कर रही है। मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि एक पंक्ति नहीं है जिसका अर्थ वास्तव में लिया जाता हो, जो कहने वाले ने कहना चाहा था। क्योंकि अर्थ आप तभी समझ सकते हो, जब आप वहीं स्थित हो, जाओ जहाँ से वो पंक्ति आ रही है।
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वर्तमान में जीना माने क्या?

वर्तमान में जीना माने क्या?

अभी जी लें, इसका अर्थ आपको ये समझा दिया गया है, कि जितनी इच्छाएं हैं, उनको अभी पूरा कर लें, कल पर मत टालना। जो भी तेरी वासनाएं हैं, उनमें अभी उद्यत हो जा, ज़रा भी रुकना मत। जी ले!  

तो उद्योगों की, और व्यापार की, सुविधा के लिए खूब ये मुहावरा प्रचलित किया गया है, ‘लिवंग इन द प्रेसेंट।’ आप एक गाड़ी खरीदना चाहते हैं, आपने सोचा है कि दिवाली पर खरीदेंगे। आप के पास एक आता है, बेचने के लिए तैयार। वो कहता है, अरे! लिव इन द नाउ, वाय वेट फॉर द फ्यूचर?

जो गाड़ी तुमको दिवाली पर खरीदनी है, वो अभी खरीदो। रोकते क्यों हो, अपनेआप को? ये आध्यात्मिकता में, व्यवसाय का अतिक्रमण है।  इन सबके ख़िलाफ़ जागरूक रहा करें।
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इच्छा अपूर्ण, मौज पूर्ण

इच्छा अपूर्ण, मौज पूर्ण

ध्यान के अभाव में ही तो भ्रम रहता है न? ध्यान है फिर कहाँ कोई पर्दा है? इसीलिए पूछना बहुत ज़रूरी होता है कि ये बात कह कौन रहा है? पर्दा नहीं है, पर्दे के भीतर जो संसार है वही सत्य है, ये कौन कह रहा है? ये दृष्टा कह रहा है। ‘’पर्दा है, और मैं पर्दे से बाहर हूँ, देख मात्र रहा हूँ,’’ ये कौन कह रहा है? ये साक्षी कह रहा है। न दृष्टा सत्य है, न साक्षी सत्य है। कहने में ऐसा लगता है कि जैसे साक्षी मन को देख रहा हो पर भूलियेगा नहीं कि साक्षी भी मन की कल्पना ही है।
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मन के स्रोत से निकटता ही है मन की ताकत

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हमने जीवन में ये सवाल कभी ईमानदारी से पूछा ही नहीं है कि ‘महत्वपूर्ण क्या है’, क्या है जो पाने योग्य है, क्या है जो करने योग्य है? और क्योंकि हमने कभी पूछा नहीं है, हमारे भीतर खाली जगह है इसीलिए उस खाली जगह में कुछ भी कचरा भर दिया गया है।  हमने दुनिया भर के व्यापारियों को अनुमति दे दी है कि वो आएँ और हमारे मन में व्यापार करें। ये अनुमति दी हम ही ने है। समझ रहे हैं? रुकिये और पूछिए ये बात, महत्वपूर्ण क्या है? क्या ये वास्तव में महत्वपूर्ण है। और दो ही चार गिनी हुई चीजें हैं, जो समाज ने बता दी हैं कि महत्वपूर्ण हैं। उनके विषय में पूछिए कि क्या वो वास्तव में महत्वपूर्ण हैं?
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गलतियाँ और बदलाव

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हजार चीजें तो चाहते ही हो न? जिस दिन तुम उसको ही चाहने लग जाओगे, काम हो जाएगा। जितने सवाल पूछ रहे हो, उन सारे सवालों का मूल सवाल ये है कि, “मैं चाहता भी हूँ क्या?” बातें तो बड़ी समझदारी की कर रहे हो, कोई जानना चाहता है बोध के बारे में, कोई प्यार के बारे में, कोई प्रभाव। कोई कुछ-कुछ। लेकिन सवालों का सवाल एक है। चाहते हो? चाहते हो जो, वो मिल जाएगा?

अगर पक्का-पक्का चाहने लगोगे कि वही मिल जाए, तो वो मिल जाएगा।लेकिन तुम चाह सकते नहीं जब तक वो न चाहे कि तुम चाहो।
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योग है अपनी बेड़ियों को अपनी ही ज्वाला में गलाना

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हम में से अधिकांश जीवन को आदतों के पीछे से देखते हैं। हम जीवन से इतने एक हो चुके होते हैं, इतने अभ्यस्त हो चुके होते हैं कि जो भी चल रहा होता है, हमें सहज ही लगता है। कुछ भी हमें चौंकाता नहीं है। जो भी हमारे सामने आता है, हम कहते हैं, ऐसा ही तो होता है, यही तो जीवन है; दुनिया ऐसी ही तो है, संसार ऐसे ही तो चला है और चलेगा। हम में किसी प्रकार का विरोध उठना तो छोड़िये, सवाल भी नहीं उठता। बोध तो छोड़िये, जिज्ञासा भी नहीं उठती। हम बस स्वीकार किये जाते हैं और ये स्वीकार, अप्रतिरोध नहीं है। क्योंकि जो स्वतंत्र चैतन्य प्रतिरोध कर सके, वो हमारे पास होता ही नहीं है। जो मन, होनी पर सवाल उठा सके, वो मन हमने कहीं दबा दिया होता है। तो निष्पत्ति ये होती है कि खौफ़नाक से खौफ़नाक मंज़र भी हमें साधारण लगता है। और साधारण वैसे नहीं लगता जैसा किसी ज्ञानी को लगे, साधारण ऐसे लगता है कि, खौफ़ तो जीने का तरीका है ही ना। इसी को तो जीवन बोलते हैं, तो अचम्भा कैसा?
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जगते में जागे नहीं सोते नहीं सोए, वही जाने कृष्ण को दूजा न कोय

जगते में जागे नहीं सोते नहीं सोए, वही जाने कृष्ण को दूजा न कोय

संतों के, अवतारों के वचनों को बड़े समर्पण, बड़ी सतर्कता और बड़े ध्यान के साथ पढ़ें। एक नया ही कान चाहिए उन्हें सुनने के लिए, जब आपको लग भी रहा हो कि इन्होनें जो बात कही वो ठीक है, तो और सतर्क हो जाइए। चूँकि सम्भावना कम ही है कि सत्य आपको ठीक लगेगा। कृष्ण की बात अगर आपको प्रथमतया ही आपको जंच जाए और रुच जाए, तो संभावना यही है कि आप समझें ही नहीं हैं कि कृष्ण क्या कह रहे हैं, और कृष्ण के वचन का आपने अपनी सुविधा अनुसार, अपने अनुकूल कोई अर्थ कर लिया है और विधि यही है कि जो कुछ कहा गया हो, उसे बस दो हिस्सों में बाट लें क्यूँकी दो शब्दों के अलावा कृष्ण कोई तीसरा शब्द बोलते नहीं और अंततः वो ये चाहते हैं कि आप इन दो शब्दों के भी पार निकल जाएँ और गहरे मौन में प्रवेश कर जाएँ। वही मौन सत्य है।
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खेल के जारी रहने में मज़ा है और काम के खत्म हो जाने में

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खेल वो होता है, जो दो बच्चे खेलते हैं आपस में। वहाँ ये कोशिश नहीं की जाती कि जल्दी से जल्दी जीत लूँ और खेल ख़त्म हो जाए। वहाँ तो प्रेम में खेला जाता है और कहा जाता है कि ऐसा खेलो कि खेलते ही रहो। ये नहीं कहा जाता कि, “अरे वाह! पंद्रह अंक बनाने थे जीतने के लिए। मैंने पहले बना लिए। खेल ख़त्म।” न! तो बड़े जो खेल खेलते हैं, और बच्चे जो खेल खेलते हैं, उसमें ज़मीन-आसमान का अंतर है। बड़े जो खेल खेलते भी हैं, वो खेल नहीं है। वो खेल भी हमारे प्रतियोगी मन से निकला है। वो हिंसा है एक प्रकार की। वो अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने का उपाय है।
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कौनसी किताबें पढ़नी चाहिए?

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13-14 साल तक अगर बच्चे इधर-उधर का ही साहित्य पढ़ा है, तो 13-14 साल बाद अगर आप उसके हाथ में कुछ अच्छा थमाएंगे भी न, तो वो उसको पढ़ नहीं पाएगा। उसको रुचि ही नहीं आएगी। वो कहेगा कि, ‘’मुझसे फिक्शन कितना भी पढ़वा लो, मैं पढ़ लूँगा पर ये बोरिंग लगता है।’’ ठीक वैसे ही जैसे आपको बोरिंग लगता है। बोरिंग इसीलिए लगता है क्यूँकी जो पूरी खुराक है, वो गन्दी हो चुकी है। पता नहीं किससे मैं बोल रहा था कि कबीर इसको बहुत अच्छे से समझाते हैं और एक ही वाक्य में सब समझा देते हैं। वो कहते हैं कि, ‘’मन को ऐसा कर लो, जैसे हंस।’ और हंस और कौवे का जो अंतर है, वो उसको सामने रखते हैं। कौवा जहाँ भी कुछ पाता हैं, उसमें चोंच मार देता है। विष्ठा, कूड़ा, गन्दगी में चोंच डाल देगा वो। हंस भूखा मर जाएगा, पर गन्दगी में चोंच नहीं डालता वो, आकर्षित ही नहीं होता। तो इसीलिए कहते हैं कि वो सिर्फ़ मोती चुग-चुग के खाता है।
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जीवन गँवाने के डर से अक्सर हम जीते ही नहीं

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जब आदेश का पालन करते हो, तो फिर जहाँ से आदेश आता है, वहीँ से उस आदेश के पालन की ऊर्जा भी आ जाती है। वही दे देता है उर्जा, और वही एक मात्र उम्मीद है तुम्हारी, वहीं से जीत है तुम्हें, और कहीं से नहीं मिलेगी। भूलना नहीं कि तुम्हारी अपनी ऊर्जा तो तुम दूसरों को दे आए हो, तुमने अपनेआप को तो बेच ही दिया है। तुम्हारी अपनी बंदूक तो अब तुम्हारे ऊपर ही चलेगी। ये संसार तुम्हारे ऊपर जो बंदूके ताने बैठा है ये संसार ये नहीं है, ये तुम्हारी बंदूके हैं। ये दुनिया जो तुम्हें बन्धनों में कसे बैठी है, ये हक़ दुनिया को किसने दिया? तुमने दिया।
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अपनी आदतों के सिवा मैं कुछ और नहीं

अपनी आदतों के सिवा मैं कुछ और नहीं

आदतें जानते हो आप, जो कुछ भी जानकारी के दायरे में आता है, अतीत से आता है, जो भी आप जानते हो और बार-बार करना चाहते हो, जो बार दोहराना चाहते हो, जिसमें मन को सुरक्षा की भावना मिलती है – वो आदत है। मन कहता है, ‘’मैं एक राह पर चल रहा था पिछले 20 सालों से और मेरा कुछ ख़ास बिगड़ नहीं गया , तो अब मैं इसी राह पर और 20 साल चल लेता हूँ। जब आज तक नहीं कुछ हुआ तो अब क्या होगा’’ – यही आदत है। और मैं हूँ कौन? उससे राह पर चलने वाला।
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संत के शब्द – एक आमन्त्रण

संत के शब्द – एक आमन्त्रण

पूर्ण के किसी हिस्से में कोई अतिरिक्त पूर्णता तो नहीं होती। पूर्ण से पूर्ण निकलता है, तो भी पूर्ण ही शेष रहता है। क्या प्रतीक्षा करनी किसी नयी पत्ती की? क्या प्रतीक्षा करनी किसी भी फल की? असंख्य बार अनगिनत वृक्ष लगे हैं, और अनंत संख्या है पत्तों की, और फलों की जो लगे हैं, और गिरे हैं और ये चलता रहेगा। ये सब तो प्रकृति का बहाव है और प्रकृति मात्र देह है, ये सब तो देह का बहाव है आना-जाना, उठना-बैठना। मन ऐसा हो कि वो प्रतीक्षा में भी प्रतीक्षागत ना रहे, मन ऐसा हो कि जब वो पौधे को सींचे और कली की, फूल की, पत्ती की कामना भी करे, तब भी निष्काम रहे। मन ऐसा हो, जिसे साफ़-साफ़ पता हो कि आधीर होने से कुछ नहीं होगा, ऋतु आये ही फल होए। लेकिन साथ ही साथ, वो इस बोध में भी स्थित हो कि फल आएगा नहीं, फल है। कुछ भी नया जुड़ेगा नहीं क्यूंकि पूर्ण में कुछ नया जुड़ने का प्रश्न पैदा नहीं होता है। ना कुछ नया जुड़ेगा, ना कुछ पुराना कभी कहीं गया है। कभी कोई नया फल आने नहीं वाला, और पुराने जितने भी असंख्य फल आज तक लगे हैं, वो कहीं गए नहीं है।
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साक्षित्व का वास्तविक अर्थ

साक्षित्व का वास्तविक अर्थ

जो सोचने की वस्तु हो, उसके बारे में सोचो और जो सोचने की वस्तु नहीं है, उसके बारे में नहीं सोचो, बस यही आध्यात्म है पूरा। जिसके बारे में सोचा जा सकता है, उसके बारे में खूब सोचो पर कृपा करके उसके बारे में मत सोचने लग जाओ, जिसके बारे में सोचना व्यर्थ है। हम उलटे हैं, जिसके बारे में सोचना चाहिये वहाँ हम सोचने से डरते हैं, हम विचार भी तो नहीं करते ताकतवर, पूर्ण, गहरा विचार हम कहाँ करते है? डरते हैं। जहाँ सोचना चाहिये, वहाँ हम सोचते नहीं और जहाँ सोचना मूर्खता है, वहाँ हम खूब सोच का जाल फेंकते रहते हैं।
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आत्मज्ञान की तीन विधियाँ

आत्मज्ञान की तीन विधियाँ

विचारों के बाद आप वृत्तियों तक पहुँच जाते हैं। क्योंकि जैसे-जैसे आप विचारों की गहराइयों में जाएँगे, तो अपको धीरे-धेरे वो गाँठ भी दिखने लग जाएगी, जहाँ से सारे गाँठ निकलते हैं। ”मैं ऐसा क्यों सोचता हूँ? अच्छा, सोच रहा हूँ, स्थूल विचार तो देख ही रहा हूँ, सूक्ष्म विचार भी दिखने लगे हैं।” फिर आप वहाँ तक भी पहुँचने लग जाते हैं, जो आपकी मूल ग्रंथियां होती हैं। उन ग्रंथियों के भी मूल में, जो गहरी से गहरी ग्रंथी बैठी है, ‘अहम् वृत्ति’, वहाँ तक पहुँच जाते हैं। और उसके बाद कुछ जानने को शेष नहीं रह जाता। उसके बाद जो है, उसे ज्ञान नहीं कहा जा सकता। जिसें विचारों को, वृत्तियों को और अंततः अहम् वृत्ति को देख लिया, जो इनका साक्षी बन गया, वो अब वहाँ पर पहुँच जाता है, जहाँ पर ज्ञान की सीमा आ जाती है। अब उसके आगे ज्ञान नहीं है, आप कह नहीं पाओगे, ”मैंने जाना क्योंकि जानने का काम ही वही अहम् वृत्ति करती है। अब साक्षी हो पाओगे, अब डूब पाओगे पर अब जानना ख़त्म हुआ।”
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प्रेम और आकर्षण

प्रेम और आकर्षण

आप तीस-चालीस साल किसी भी चीज़ के साथ रहो, आपको आदत पड़ जाएगी। आप एक छड़ी के साथ रहो, तो आप बिछुड़ नहीं पाओगे। आप एक जानवर के साथ तीस साल रहो, आपको आदत पड़ जाएगी। आप एक मोटर कार तीस साल चलाओ, आपसे वो बेची नहीं जाएगी – ये प्रेम नहीं है। और अक्सर जो पुराने लोग होते हैं, थोड़े उम्र दराज़, वो आज कल के लोगों को यही कहते हैं कि तुम्हारा प्यार क्या है? तुम्हारा प्यार सिर्फ़ शारीरिक आकर्षण है। ”मुझको देखो, अपनी दादी को देखो, हम में कोई शारीरिक आकर्षण नहीं, फिर भी हम कितने जुड़े हुए हैं।” उनकी बात यहाँ तक तो ठीक थी कि जवान आदमी का जो प्यार है, वो क्या है? शारीरिक आकर्षण। लेकिन वो भूल गए कि अगर जवान आदमी के पास प्रेम नहीं है, तो प्रेम तुम्हारे पास भी नहीं है। वो जुड़ा है शरीर के वशीभूत होकर और तुम जुड़े हो आदत के वशीभूत होकर।
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