श्री प्रशान्त - उद्गार मौन के

धोखा मत खा जाना

धोखा मत खा जाना

सुन्न हो जाने की, संवेदना-शून्य हो जाने की दवाइयाँ, आप जीवन भर भी ले सकते हो। नंबनेस की हज़ार विधियाँ मौजूद हैं। और उन्हें आप जीवन भर ले सकते हो, और लेते लेते सो भी सकते हो, ख़त्म हो सकते हो, मर सकते हो। और पूरा जीवन आपको वो आवाज़ सुनाई नहीं देगी जो आपसे […]

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ईमानदारी के अलावा कोई विधि नहीं

ईमानदारी के अलावा कोई विधि नहीं

जिन्हें दिखना होता है, उन्हें दिख जाएगा। जो इतना डूबे न हों, जो इतने खोये न हों। सही शब्द का प्रयोग किया तुमने, ‘ईमानदारी’, जिनमें ज़रा ईमानदारी हो, उन्हें दिख जायेगा। वो कहेंगे, “न, कुछ गड़बड़ है, बहुत बड़ी गड़बड़ है। मैं जिस बहाव में हूँ, वो कोई गड़बड़ बहाव है। ऐसा नहीं कि वो मुझे गलत दिशा में ले जा रहा है, वो गलत तल पर है। ऐसा नहीं कि वो मुझे किसी गलत सागर में डुबो देगा, वो बहाव ही अम्लीय है, एसिडिक है।” आप किसी ऐसी नदी में डाल दिए गए हो, जिसमें तेज़ाब ही तेज़ाब है, अब फ़र्क़ नहीं पड़ता कि वो नदी किस सागर में जा कर मिलेगी।

उस नदी में डाला जाना ही तुम्हें ख़त्म कर रहा है, नष्ट कर रहा है। उस नदी में तुम्हारी मौजूदगी ही अभिशाप है तुम्हारे लिए। दिक्क्त बस इतनी है, कि क्योंकि तुम तेज़ाब की नदी में डाल दिए गए हो, इसलिए क्षण क्षण तुम घुलते जा रहे हो। तुम्हारी चेतना, तुम्हारी संवेदना नष्ट होती जा रही है। जितनी देर तुम उस नदी में रहोगे, उतना तुम्हारे लिए असम्भव हो जाएगा ये जानना कि कुछ गलत है। क्योंकि जानने के जो तंतु हैं, जानने की जो आतंरिक व्यवस्था है तुम्हारी, ठीक उस व्यवस्था को ही वो तेज़ाब खाये जा रहा है। जितनी देर तक तुम उस नदी में हो, उतनी ये सम्भावना घटती जाती है, कि तुम कभी भी कह पाओगे, कि मैं गलत बहाव में हूँ, मैं गलत नदी में हूँ। नदी ने ही ये तय कर दिया है कि अब तुम जान नहीं पाओगे।
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मन आदत से मजबूर होता है|

मन आदत से मजबूर होता है|

मन जैसे जैसे, सच्चाई के संपर्क में आता है, उसके साथ दो घटनाएँ घटती हैं। पहली तो ये, कि डर छोड़ता जाता है, और दूसरी ये कि क्योंकि वो डर से ही पोषण पाता था, डर पर ही ज़िंदा रहता था, तो डर छोड़ने के कारण बेचैन होता जाता है। ये तो उसको दिखता है, […]

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सत्य – सज़ा भी, दवा भी

सत्य – सज़ा भी, दवा भी

मन जैसे जैसे, सच्चाई के संपर्क में आता है, उसके साथ दो घटनाएँ घटती हैं। पहली तो ये, कि डर छोड़ता जाता है, और दूसरी ये कि क्योंकि वो डर से ही पोषण पाता था, डर पर ही ज़िंदा रहता था, तो डर छोड़ने के कारण बेचैन होता जाता है । ये तो उसको दिखता है, कि डर छोड़ा है, तो हल्कापन है। ये तो उसको दिखता है, कि ज़िम्मेदारी छोड़ी है, भविष्य की चिंता छोड़ी है, तो एक हलकापन  है। लेकिन आदत से मजबूर होता है। पुरानी आदत लगी होती है ना। पुरानी आदत उससे बोलती है, कि तूने ज़िन्दगी में जो भी पाया, जितनी भी सफलता, जितनी भी सक्सेस पायी, वो हिंसा से पायी, डर से पायी, प्रतिस्पर्धा से पायी। तुलना से पायी, चिंता से पायी, योजना से पायी। तो मन, तर्क ये देता है कि अगर तूने ये सारी चीज़ें छोड़ दीं, सफलता की चाह, योजना बनाना, तुलना करना, डर में जीना, लक्ष्य पाने के तनाव में रहना। अगर तूने ये सारी चीज़ें छोड़ दीं, तो तेरा होगा क्या, क्योंकि आज तक तो तू इन्हीं पे ज़िंदा रहा है, और आज तक तुझे जो मिला है, वो इन्हीं के चलते मिला है। तू इन्हें छोड़ देगा, तो तेरा होगा क्या? ये मन का तर्क है।

आचार्य प्रशांत

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मन, हर उस चीज़ से डरेगा जो सीमित है

मन, हर उस चीज़ से डरेगा जो सीमित है

मन, हर उस चीज़ से डरेगा जो सीमित है। क्योंकि जो कुछ भी सीमित है उसे ख़त्म हो जाना है। और मन बिना छवि बनाये जी नहीं सकता। तो मन कहने को तो, नाम मात्र को तो कह देता है कि ‘अननोन’ (अज्ञात) । ‘अननोन’ का विशुद्ध अर्थ तो यह हुआ ना, कि उसके बारे […]

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मन अनजाने से भी डरता है और जाने हुए से भी

मन अनजाने से भी डरता है और जाने हुए से भी

जब संत समझाते हैं कि अब चेतो, तो वो यही कहते हैं, कि अब चेतना के पार जाओ। चेतना इतनी बढ़ाओ, इतनी उठाओ, कि चेतना के पार निकल जाओ। कॉन्शियसनेस्स (चेतना)और अवेयरनेस (बोध)का अंतर है। कॉन्शियसनेस्स जब गहरी हो जाती है, तो मौन हो के, ख़त्म हो कर के जो बचता है वो निःशब्द, शून्य, शांत, अवेयरनेस है। वहाँ द्वैत नहीं है। चेतना जब तक है, वहाँ द्वैत है।
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स्वयं न गिर जाएँ।

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स्वयं न गिर जाएँ। जैसे गिरते हुए का वेग होता है, एक कर्षण होता है कि वो औरों को भी अपने साथ नीचे खींच लेना चाहता है, गिरा लेना चाहता है। ठीक उसी तरह से न गिरने का भी अपना एक कर्षण होता है। उसका भी अपना एक महत्व होता है। जैसे समझ लीजिये कि […]

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गिरते हुए समाज में मेरे लिए सही कर्म क्या है?

गिरते हुए समाज में मेरे लिए सही कर्म क्या है?

गिरता हुआ समाज औरों को और गिराता है। अपने साथ गिराता है। गिरते हुए समाज के मध्य में अगर आप बैठे हैं तो आपका धर्म है कि अपने आस पास गिरती हुई चीज़ों और इंसानो और व्यवस्थाओं के साथ आप स्वयं भी न गिर जाएँ। यही धर्म है आपका।

आचार्य प्रशांत
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कौन है गुरु? जो आदत से मुक्ति दिला दे।

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आदत की बात है और कुछ भी नहीं है। जिसको आप कहते हैं मेरा जीवन वो सिर्फ एक आदत है। एक लम्बी चौड़ी आदत। उसमे मिल कुछ नहीं रहा है, कोई शांति, कोई प्रेम नहीं है उसमें। बस आदत है। कुछ चीजें हैं-उनके प्रयोग की आदत है; कुछ चहरे हैं-उन्हें देखने की आदत है; कुछ विचार हैं-उन्हें […]

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पानी में घर मीन का, काहे मरे पियास

पानी में घर मीन का, काहे मरे पियास

गुरु की एक बड़ी अच्छी परिभाषा हो सकती है। कौन है गुरु? जो आदत से मुक्ति दिला दे। आदतों को तोड़ दे, और याद रखना हर आदत के साथ तुम थोड़ा-थोड़ा टूटते हो। आदत यूँ ही नहीं जाती क्योंकि तुम, और कुछ हो ही नहीं तुम सिर्फ आदतों के पिंड हो। तुम जिस भी बात को अपना कहते हो, जिसके साथ तुमने अपने आप को परिभाषित किया है, वो तुम्हारी एक गहरी आदत है। आदत के साथ तुम भी जाओगे। और तुम्हारे जाने का अर्थ है केंद्र की ओर वापस आना।

आचार्य प्रशांत
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अस्तित्व हँसेगा और नाचेगा भी तुम्हारे साथ, जगत नहीं  नाचेगा|

अस्तित्व हँसेगा और नाचेगा भी तुम्हारे साथ, जगत नहीं नाचेगा|

‘ऐसी करनी कर चलो हम हँसे जग रोए ’| अस्तित्व हँसेगा और नाचेगा भी तुम्हारे साथ, जगत नहीं  नाचेगा| सम्भव नहीं है कि वो स्थिति आए कि तुम भी हँसो और जगत भी हँसे| जिस दिन तुम वाकई हँसे उस दिन जगत रोएगा ही क्योंकि जगत के होने का अर्थ ही है भ्रमों  का होना| […]

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हम हँसें जग रोये

हम हँसें जग रोये

जब बुद्ध कहते हैं कि संसार दुःख है, जीवन दुःख है, तो वो नहीं कह रहे हैं कि ये संयोगवश है| वो कह रहे हैं कि उसकी प्रकृति ही दुःख है| वो दुःख के अलावा कुछ और हो नहीं सकता| उसने दुःख छोड़ा तो उसे मिटना पड़ेगा| जग हँसे हम रोये; आपके रोने से आपका समस्त जीवन है, कुछ ऐसा नहीं है आपके जीवन में जो आपके आनंद से है| जरा सा अगर आप गौर से देखेंगे तो बहुत साफ़ हो जाएगा की मन मे जो कुछ भी है दिल की किताब का एक-एक पन्ना दुःख की ही स्याही से ही लिखा गया है| देखिये साफ़-साफ़ और बताइये कि आपके सारे सम्बन्धो का आधार – निराशा, पीड़ा, क्षोभ, भय, लोभ, मोह ये हैं की नहीं हैं? क्या एक भी सम्बन्ध है आपका जिसका आधार आनंद है? एक भी? और ये आपके सारे सम्बन्ध संसार के सम्बन्ध है| आप जितना रोते हो उतने आपके सम्बन्ध बनते है|

जग हँसे हम रोये, जगत का व्यापर आगे बढता है और आपकी पीड़ा सघन होती जाती है| आप जितना तड़पते हो, आप उतना महत्वाकांक्षा की दौड़ में आगे बढ़ते हो| आपको कुछ बनना है, आपको कुछ पाना है, आप प्रगति ततरक्की चाहते हो| बाजारें और सजती जायेंगी, लोग बढ़ते जायेंगे, माल बिकता जायेगा| जगत गहराता जायेगा और आप देख भी नही पाओगे कि ये सब कुछ आपके कष्ट की बुनियाद पर हो रहा है और मूढ़ता की पराकाष्टा ये है कि आप ये दावा करोगे कि ये सब कुछ मेरे लिये अच्छा है|

~आचार्य प्रशांत
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मन का मैल

मन का मैल

मैल क्या है? मैल ये भ्रम है, मैल ये भाव है कि मैं वो हूँ जो मैं अपने आप को समझता हूँ, यही मन का मैल है, और यही मन है| क्योंकि ये मैल यदि हट गया तो मन वो रहेगा ही नहीं जो वो अपने आप को समझता है| हम सब अपने आप को […]

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गुरु का काम क्या है?

गुरु का काम क्या है?

हम क्या हैं? हम परतें हैं| हम एक के बाद एक कपड़ो की परतें हैं, हम आवरण की परतें हैं, हम संस्कारों की पर्ते हैं, उसको ही कपड़ा कहा जाता है, कपड़ा और कुछ नहीं है| हमारा भ्रम ये रहता है कि परतें ठीक हैं, उनमे बस थोड़ा सा कुछ गन्दा हो गया है| हमें ये समझ में नहीं आता है कि परत थोड़ी सी गंदी नहीं है, परत पूरी की पूरी ही गंदी है| तुम में दुर्गुण नहीं आ गया है, दुर्गुणों का नाम ही तुम हो|

आचार्य प्रशांत
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आत्मा ही ब्रह्म है

आत्मा ही ब्रह्म है

आत्मा जानती है, आत्मा सोचती नहीं है| तुम्हारे जीवन में जो कुछ भी ऐसा है जहाँ बिना सोचे जान लिया गया है और पुख्ता जान लिया गया, संदेह की कोई संभावना नहीं है, वही आत्मा है| जब कहा जा रहा है कि आत्मा ही ब्रह्म है| तो कहा जा रहा है कि बाहर के पूरे […]

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चार महावाक्य

चार महावाक्य

यह आत्मा ही ब्रह्म है| जो आत्मा को जानते हैं उन्हें आत्मा में और ब्रह्म में कोई अंतर नहीं दिखाई देता| लेकिन जो शरीर की दुनिया में जीते हैं उन्हें शरीर में और संसार में सदा भेद दिखाई देता है| भेद ही नहीं, उन्हें शरीर और संसार में विरोध भी निरंतर दिखाई देता है| वो लगातार शरीर को बचाने की कोशिश में लगे रहते हैं| दुनिया से इनका रिश्ता खिंचा -खिंचा सा होता है| दुनिया से उनका रिश्ता हिंसा का रहता है|

आचार्य प्रशांत
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जो निर्विशेष हो गया, वो ही संत है|

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जो निर्विशेष हो गया, वो ही संत है| जिसका कुछ भी अब व्यक्तिगत नहीं रहा, सो संत| जिन सब बातों को हम बड़प्पन का, विशिष्टता का सूचक मानते हैं, बड़ी संभावना है कि वो संत में दिखाई ही न दे| संत जब अपना आपा खो देता है, अपनी सत्ता खो देता है, तो उसके माध्यम […]

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जिसके खालीपन में झलके अनंत, उसी को शून्यवत कहो उसी को संत

जिसके खालीपन में झलके अनंत, उसी को शून्यवत कहो उसी को संत

वो तो बड़ा भुलक्कड़ है, उसके पास यादाश्त भी नहीं है| पक्का समझ लीजिए कि उसके पास कोई स्मृति नहीं है| उसको पिछले एक क्षण का भी नहीं याद रहता, उसके पास सिर्फ वर्तमान है| वही वर्तमान है|

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कृष्ण की मुरली दिल में बजती है|

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अनहद नाद कानो से नही सुना जाता है| उसी तरीके से संतो के, उपनिषदों के शब्द हैं कानो से नहीं सुने जाते, कहीं और से सुने जाते हैं, ह्रदय से| कृष्ण की मुरली अगर कानो से सुनी जा सकती तो यकीन जानिये कृष्ण से बेहतर मुरली वादक बहुत हैं| शास्त्रीय रूप से मुरली बजाएँगे, तैयारी […]

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मुरली बाज उठी अनघाता

मुरली बाज उठी अनघाता

कृष्ण की मुरली दूसरी है, वो दिल में बजती है| और अगर दिल में नहीं बज रही बाहर-बाहर ही सुनाई दे रही है तो आपने कुछ सुना नही| बुल्लेशाह की काफी हो, ऋभु के वचन हो, किसी संत, किसी ऋषि की वाणी हो, जब उसको सुनियेगा तो ऐसे ध्यान से सुनियेगा कि कान बेमानी हो जाएँ अनुपयोगी हो जाएँ| फिर आप कहें कि अब कानो पे ध्वनि पड़े न पड़े, शब्द भीतर गूंजने लगा है| शब्द तो माध्यम था, तरीका था, साधन था, आग अब लग गयी| हमारे भीतर लग गयी है| मुरली बज गयी, अब हमारे भीतर बज रही है, अब उसे नहीं रोका जा सकता |

आचार्य प्रशांत
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अद्वैत बोध शिविर

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सम्पादकीय टिप्पणी :

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