गहराना

सन्नाटा

सन्नाटा

सन्नाटा शब्द से तो आप परिचित हैं| ध्वनि प्रदुषण के इस युग में सन्नाटा आप को डराता भी  होगा| परन्तु ब्रजमंडल में सन्नाटा अपनी अलग शान रखता है| कोई अच्छी दावत नहीं जो सन्नाटे के बिना पूर्ण हो सके| जड़ों के कटते हुए कुछ लोग जरूर दावतों में अजब गजब सा रायता रखने लगे हैं| […]

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लोरियां

लोरियां

बचपन में हम सबने सुनीं हैं लोरियां| माएं, दादियाँ, नानियाँ सुनातीं थी लोरियां| जब पिता के मन में ममता जागती है, तब भी लोरी सुनाई देती है| लोरियां माँ के दूध के बाद ममता का सबसे मीठा भाव है| संगीत और शब्द का नैसर्गिक सरल और सुलझा हुआ रूप लोरियां| अधिकतर लोरियां स्वतःस्फूर्त होतीं है| […]

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नीम का पेड़

नीम का पेड़

नीम का पेड़ पढ़ते हुए आपको हिन्दुस्तान की उस राजनीति दांव –पेंच देखने को मिलते हैं, जो आजादी के बाद पैदा हुई| हमारी हिन्दुस्तानी सियासत कोई शतरंज की बिसात नहीं है कि आप मोहरों की अपनी कोई बंधी बंधी औकात हो| यहाँ तो प्यादे का व़जीर होना लाजमी है| व़जीर की तो कहते हैं औकात […]

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चिदंबरम’स न्यू मद्रास होटल, खन्ना मार्किट

चिदंबरम’स न्यू मद्रास होटल, खन्ना मार्किट

जब से मैं लोदी रोड इलाके में रहने आया हूँ, यह मेरा पसंदीदा भोजनालय है| दिल्ली शहर के कई बड़े नामी दक्षिण भारतीय भोजनालय, मेरी राय में, स्वाद में इसके मुकाबले नहीं ठहरते| हर महीने मैं एक बार यहाँ से कुछ न कुछ गृह वितरण पर मंगाया जाता है| भोजन घर मंगाने का हमें थोड़ा […]

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शिब्बो की कचौड़ी, अलीगढ़

शिब्बो की कचौड़ी, अलीगढ़

शिब्बो ने आठ साल की उम्र में सन 1951 में कचौड़ी बेचना शुरू किया – आज से छियासठ साल पहले| उनके बेटे ने रणजी खेला, उनका पौत्र ऑफलाइन-ऑनलाइन कचौड़ी बेचता है| दुकान का नाम जय शिव कचौड़ी भण्डार और वेबसाइट का नाम शिब्बोजी है| होते रहिये| हम अलीगढ़ वालों के लिए वो शिब्बो और उनकी […]

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खौलते हुए बुलबुले

खौलते हुए बुलबुले

कचनार से कच्चे और कमसिन नाजुक से कच्चे कोयले की धीमे धीमे दहकती हुई भुनी सुर्ख पंच्तात्त्विय अग्नि पर होलिका सी डरी सहमी सिमटी सिकुड़ी से बैठी हुई उस शर्मीली सिल्बर[1] की सुन्दर सुडौल भगौनी में नरक के कडुए काले कड़ाहों में तपते हुए बसंत के भरमाये घमंडी कडुए तेल[2] की मानिंद खौलते हुए उस […]

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अशोक चाट भंडार, चावड़ी बाज़ार

अशोक चाट भंडार, चावड़ी बाज़ार

मैं अक्सर चावड़ी बाज़ार मेट्रो स्टेशन के गेट नंबर ३ का प्रयोग नहीं करता| वरना सौ की पत्ती का खर्चा पक्का है| फिर भी यह बात अलग है कि मैं जब भी चावड़ी बाज़ार जाता हूँ तो यहाँ अक्सर पहुँच ही जाता हूँ| यह हौज़ काज़ी चौक है और यहीं है अशोक चाट भंडार| मेरा […]

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गोविंदा का छप्पन भोग

गोविंदा का छप्पन भोग

प्राचीन भारत में व्यवसायी धार्मिक हुआ करते थे आजकल धर्म व्यवसायिक हो गए हैं| लम्बे समय से कुछ धर्म-सम्प्रदाय मात्र अपने अनुयायियों के लिए उत्पाद बनाते और बेचते रहे हैं| इससे इनके आश्रम, मठ, मंदिर, मस्जिद के खर्चे निकल जाते थे| महंगे प्रसाद और ऊँचे चंदे देने के बाद मिलने वाले भोजन पर चर्चा करना […]

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ऊर्जावान भोजन

ऊर्जावान भोजन

भोजन भी विचित्र है| पृथ्वी पर प्रचुर भोजन होने के बाद भी एक तिहाई विश्व भोजन के अल्पता और एक तिहाई भोजन की अधिकता के बीमार और मृत होते हैं| न जाने क्यों? अति सर्वदा वर्जित ही है| भोजन के सन्दर्भ में किसी प्रकार भी अति इसे विष बनाती है| भोजन वाली भूख तीन प्रकार […]

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कतीर (गोंद कतीर)

कतीर (गोंद कतीर)

गर्मियों के प्रमुख देशी खाद्यों में से एक है कतीर या गोंद कतीर| इसके नाम में गोंद शब्द आने से हिंदी कम समझने वाले हिन्दीभाषी भी इसे चिपचिपी चीज समझ लेते हैं| ऐसा नहीं है| दरअसल गोंद शब्द किसी भी रेसिन (resin) के लिए प्रयोग होता है न कि किसी चिपकने वाले पदार्थ के लिए| […]

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मैं और मिच्छामि दुक्कडम्

मैं और मिच्छामि दुक्कडम्

सभी के जीवन में कष्ट, कठिनाई, दुःख, क्रोध, घृणा, अवसाद आते हैं| उनके आवृत्ति और अन्तराल भिन्न हो सकते हैं| मेरे और आपके जीवन में भी आये हैं| सबको अपने दुःख प्यारे होते हैं| मैं और आप – हम सब उनके साथ जीते हैं| मैं क्या जानूं, दुःख क्यों आये| जब सोचता हूँ, तो हर […]

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पाठशाला पढाई के लिए नहीं है

पाठशाला पढाई के लिए नहीं है

“शिक्षे, तुम्हारा नाश हो, तुम नौकरी के हित बनी|” अगर होते, मैथली शरण गुप्त अवश्य सोचते| क्या उन्होंने उनका श्राप सत्य हुआ? आज भारत के शिक्षित लोग रोजगारपरक नहीं माने जा रहे – अनियोज्य हैं, अप्रयोज्य हैं| किन्हीं माता-पिता से पूछिए| पाठशाला का चयन कैसे करते हैं – निकटता, बेहतरीन भवन, वातानुकूलन, गैर-पाठ्य-गतिविधि, सुरक्षा, नगर-भ्रमण, […]

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काके – दी- हट्टी, फ़तेहपुरी

काके – दी- हट्टी, फ़तेहपुरी

काके – दी – हट्टी को जब आप बाहर से देखते हैं तो समझ नहीं आता कि आखिर क्यों इस साधारण से स्थान का नाम हर दिल्ली की हर ट्रेवल गाइड और फ़ूड गाइड में है| दुकान पुरानी सी है और लगता है कि अपने स्थापना सन १९४२ में भी इसमें बैठने की खास जगह […]

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देहरादून शताब्दी

देहरादून शताब्दी

रेलगाड़ियाँ घुमक्कड़ों की पहली पसंद हुआ करतीं हैं| मितव्ययता, समय-प्रबंधन, सुरक्षा और आराम, का सही संतुलन रेलगाड़ियाँ प्रदान करतीं हैं| अगर यात्रा दिन की है तो भारतीय रेलगाड़ियों में शताब्दी गाड़ियाँ बेहतर मानीं जा सकतीं हैं| नई दिल्ली देहरादून शताब्दी मुझे कई कारणों से पसंद है| यह आने और जाने दोनों बार सही समय पर […]

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अवैध चाय

अवैध चाय

अवैध चाय – हंसने का मन करता है न? अवैध चाय!! सच्चाई यह है कि भारत में हर कार्यालय, विद्यालय, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय, गली, कूचे, मार्ग, महामार्ग, हाट, बाजार, सिनेमाघर और माल में अवैध चाय मिलती है| अवैध चाय का अवैध धंधा पिछले पांच-छः साल से धड़ल्ले से चल रहा है| पिछले पांच-छः साल क्यों? क्यों […]

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खिचड़ी-भोग

खिचड़ी-भोग

खिचड़ी भोग भी अपने आप में एक मुहावरा है| हर किसी को पकी पकाई खीर खिचड़ी चाहिए| कोई पकाना नहीं चाहता| यह मुहावरा शायद उस जमाने में बना होगा जब खिचड़ी देग दम करके बनती होगी| आजकल तो प्रेशर कुकर का जमाना है मगर वक्त है कि आज भी कम पड़ता है| हमारे कुछ मित्र […]

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अकबर

अकबर

अकबर का दौर अजीब हालत का दौर था| एक बदहवास सा मुल्क सकूं की तरफ बढ़ता है| अपनी लम्बी पारी से भी और बहुत लम्बी पारी खेलने की चाह में अबुल मुज़फ्फर जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर बादशाह ने अपनी हालत कुछ अजीब ही कर ली थी| यह उपन्यास उस “हालत –ए – अजीब” से शुरू होता […]

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नीचे जातीं सीढ़ियां

नीचे जातीं सीढ़ियां

सीढ़ियां – उन्नति का प्रतीक| जीवन में नई ऊँचाइयाँ छूने का नाम –सीढ़ियां| धरती से आसमान तक जाती हुई; वितान तक फैली हुई उन्नत;  अनंतगामी; सुर्योंमुखी| सीढ़ियां ऊपर जातीं है| सपने में आती हुई सीढ़ियां आसमान तक जाती हैं; हवा में – बादलों के उस पार तक| भवनों, भुवनों, महलों, मंदिरों, दरवेशों – दरगाहों सबके […]

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ऊँचे कंक्रीट

ऊँचे कंक्रीट

कंक्रीट की ऊँचाई अनंत आकाश की ऊँचाई के समक्ष वामनकद होती है| अहसास कराती है – हे मानव! अभी तुम बौने हो| ऊँचे कंक्रीट, हरे भरे जीवंत जंगल की तरह स्व-स्फूर्त नहीं उग आते हैं| इनकी रचना नहीं की जाती, निर्माण होता हैं| रचनात्मकता की कमी पर्याय है इनका| कंक्रीट में प्राण-प्रतिष्ठा नहीं होती, कंक्रीट […]

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आहत भावनाओं का देश

आहत भावनाओं का देश

भावना प्रधान देश है हमारा| जान जाए पर भावना न जाए| भावनायें बचाते बचाते हमारी जिन्दगी गुजर जाती है| सदियों से हम भावनाएं बचा रहे है| दुनिया के आधे देश ज्ञान विज्ञान में तरक्की कर कर आगे निकल गए| हम अपनी “विश्व-गुरु रहे थे पुरखे” – गान गाने और उसकी भावना बचाने में लगे हैं| […]

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