बालकहानी

कुछ बातें बचपन की

कुछ बातें बचपन की

उत्तर प्रदेश के मैदानी इलाकों की खूबी है यहां की शस्य–श्यामला धरती. दूर–दूर तक फैले खेत. हरियाली से घिरे गांव. गांवों से जुड़े खेत–खलिहान. मानो बड़े हरे–भरे मैदान में किसी ने जिंदगी की चादर बिछा दी हो. आज से 45-46 वर्ष पहले, जिन दिनों को मैं याद करने को प्रयत्नरत हूं, गांवों की यही स्थिति […]

Continue reading
आजाद सरोवर की कथा

आजाद सरोवर की कथा

एक पेड़ था. पेड़ पर थे हर–हरे पत्ते. पत्तों के बीच फूटतीं, नई–ताजा कोपलें….आप सोचेंगे, इसमें नया क्या है? पेड़ है तो पत्ते भी होंगे. बिना पत्तों का तो ठूंठ होता है. मैं कहूंगा धीरज रखिए. जैसे जीवन कहीं भी पनप सकता है, कहानी भी किसी भी ओर से दस्तक दे सकती है. चलिए दुबारा […]

Continue reading
संकल्प

संकल्प

प्रदूषण का दायरा बहुत बड़ा है. सच में झूठ, आस्था में अंधविश्वास की मिलावट भी प्रदूषण है. यह सामाजिक पर्यावरण को दूषित करती है. तो बात की बात यह कि एक राजा था. बड़ा ही सत्यवान. हमेशा सच खाता, सच पहनता और सच ही ओढ़ता–बिछाता था. रात–दिन वह झूठ को धिक्कारता, सत्य की पूजा करता, […]

Continue reading
सुपर कप्तान

सुपर कप्तान

कहने को तो पूरा स्कूल था. स्कूल में अनेक कक्षाएं. प्रत्येक कक्षा में चालीस–चालीस बच्चे. फिर भी…जी, हां फिर भी चर्चा केवल उन तीन सहेलियों की होती. तीनों पढ़ने में तेज थीं. क्लास में सदा अव्वल आतीं. अंकों के मामूली अंतर से आगे–पीछे रहतीं….अध्यापक उनकी प्रशंसा करते. प्रधानाचार्य पीठ थपथपाते. मुहल्ले–पड़ोस में भी बातें उन […]

Continue reading
रोशनी की खातिर

रोशनी की खातिर

कई बार मनचीता अकस्मात हो जाता है. मैं कहानी की तलाश में निकला हुआ था कि राह किनारे इबारत देखकर चौंक पड़ा. लिखा थाᅳ‘कहानी की तलाश है, तो इधर से जाएं.’ जैसे कोई स्वप्न फला हो. मैं उधर मुड़ गया. संकरी पगडंडी को पत्तों ने ढक रखा था. पांव पड़ते ही सूखे पत्ते चरमरा उठते. […]

Continue reading
नीलतारा

नीलतारा

आजकल तो कहानी कहने-सुनने का रिवाज ही नहीं रहा. लेकिन यह कहानी उन दिनों की है, जब कथक्कड़ हर चौराहे और चौपाल पर मौजूद होते थे. घर में उसका काम दादा-दादी, नाना-नानी संभालते थे. उन दिनों, नया हो या पुराना, हर कथक्कड़ एक ही बात कहता थाᅳ‘कहानियों में कहानी नील तारे की. जिसने यह न […]

Continue reading
बूढ़ा मसीहा

बूढ़ा मसीहा

सितंबर 23 2005. तियांझिन की सड़कों से जनाजा गुजर रहा था. परंपरा से हटकर उसमें सैकड़ों छोटे बच्चे थे. उनका पहनावा ऐसा था मानो कबाड़ बीनते–बीनते जनाजे में चले आए हों. उनके अलावा स्कूल के विद्यार्थी, जो खबर मिलते ही कक्षा छोड़कर अंतिम यात्रा में चले आए थे. साथ में जनाजे के पीछे चलते सैकड़ों […]

Continue reading
विविध की डायरी

विविध की डायरी

विविध के दादू को डायरी लिखने का शौक है. बोर्डिंग में जाने पर विविध को घर की याद आई तो उसने भी कलम उठा ली. ये पन्ने उसी की डायरी के हैं, जो उसने अपने दादू को संबोधित करते हुए लिखे हैं— 17 फरवरी 2015 आज बोर्डिंग का तीसरा दिन है. मैं दो दिनों तक […]

Continue reading
लखनऊ : तहजीब-पसंदों का जिंदादिल शहर

लखनऊ : तहजीब-पसंदों का जिंदादिल शहर

यात्रा संस्मरण दिल्ली-लखनऊ राजधानी का सफर. गाड़ी अपनी तेजी से भाग रही है. रात्रि-भर का सफर पूरा कर पड़ाव पर पहुंचने को उत्सुक. करीब डेढ़ घंटे बाद अपने गंतव्य पर होगी. करीब सवा सौ किलोमीटर का सफर बाकी. अंधियारा छंटने के साथ साथ ही हरियाले खेत और पेड़-पौधे नजर आने लगे हैं. सभी तेजी से […]

Continue reading
डॉ. राष्ट्रबंधु : बालसाहित्य का यायावर

डॉ. राष्ट्रबंधु : बालसाहित्य का यायावर

उनका जन्म 1913 में हुआ था. साधारण परिवार में. पारिवारिक नाम था, कृष्णचंद्र तिवारी. बाद में पढ़ने से लेकर नौकरी करने तक संघर्ष की लंबी गाथा है. बताते हैं पेट भरने के लिए उन्होंने बूट पालिश और मजदूरी तक कह1960 से लेकर 1976 तक छतीसगढ़ के विद्यालयों में अंग्रेजी का अध्यापन किया. बच्चों के लिए दो दर्जन से अधिक पुस्तकें लिखीं. इसके अलावा ‘बालसाहित्य समीक्षा’ का नियमित प्रकाशन. ‘बालसाहित्य कल्याण संस्थान’ द्वारा बालसाहित्य संवर्धन में निरंतर योगदान देते रहे. वे खूब यात्रा-पसंद थे. बालसाहित्य के लिए जीनेवाले उस चिर यायावर के लिए इससे बड़ी बात क्या हो सकती है कि उसकी अंतिम सांस भी उस समय निकले जब वह बालसाहित्य के संवर्धन के लिए सफर में हो. डॉ. राष्ट्रबंधु ऐसे ही विरले इंसान थे…..

Continue reading
छबीला

छबीला

‘बताइए, तारों से ज्यादा कौन?’ ‘कहानियां.’ ‘झूठ.’ ‘सच.’ ‘तारे अनगिनत हैं. अरबों तारे ऐसे होंगे जो धरती के जन्म से लेकर आज तक अंतरिक्ष में बिला चुके हैं. अरबों तारे जन्म लेने वाले हैं. अरबों के बारे में इंसान को आज भी पता नहीं है.’ ‘कहानियां अनगिनत हैं….तारों से कहीं ज्यादा. अरबों कहानियां भुला दी […]

Continue reading
अच्छाई की वाह-वाह

अच्छाई की वाह-वाह

बुराई की सीमा होती है. कोई बुरा करे तो सब टोकने लगते हैं—‘बहुत हुआ, अब बस भी करो.’ कहते हुए घेराबंदी कर लेते हैं. अच्छाई निस्सीम होती है. चाहे जितना परोपकार करो, कुछ और करने का उत्साह बना रहता है. ‘वाह…वाह! क्या बात है? खूब फलो–फूलो. ऐसे ही लोगों का दिल जीतते रहो.’ लोग बढ़–चढ़कर […]

Continue reading
खरगोश बादल

खरगोश बादल

बात उन दिनों की है जब आसमान सचमुच नीला हुआ करता था. तारे एकदम साफ. झक सफेद, चंद्र-किरणों के साथ झूमते-गाते, हंसते-खिलखिलाते हुए. मानो नीले कालीन पर किसी ने चांदी के बूटे बिखेर दिए हों अथवा किसी मतवाले ने सफेद चमकीले मोतियों से भरी विशालकाय परात को औंधा कर दिया हो. नाना जी अकसर कहा […]

Continue reading
उड़ान

उड़ान

एक पंख चिडि़या का टूटा तो टूटा…. पंख उड़ा उड़के पहुंचा बादल के पास. ‘तुम, यहां किसलिए?’ नन्हे बादल ने टोका. ‘मुझे इंद्रधनुष से मिलना है.’ ‘बादल और बिजली के सिवाय वे किसी से नहीं मिलते.’ ‘तुम उनसे कहो….मैं उन्हें उड़ना सिखाऊंगा. क्षितिज के एक कोने में पड़े-पड़े वे बोर हो जाते होंगे. मैं उन्हें […]

Continue reading
कछुए की उड़ान: संवेदना का सौ फीसद शब्दांकन

कछुए की उड़ान: संवेदना का सौ फीसद शब्दांकन

मैंने बालउपन्यास अधिक नहीं पढ़े हैं. इसलिए उपन्यास पर तुलनात्मक रूप से कुछ कह पाना मेरे लिए कठिन होगा. लेखक ने इसे पर्यावरण केंद्रित उपन्यास माना है. हमारे यहां पर्यावरण को ज्यादातर लेखक फैशन के तौर पर लेते हैं. वे रचना को ज्यादा से ज्यादा विषयकेंद्रित करने के फेर में रहते हैं. इस कोशिश में […]

Continue reading
बेबी का एक दिन

बेबी का एक दिन

6-30 बजे प्रातः आज सुबह मैंने मम्मी के आंचल से सटने की कोशिश की. उन्होंने रोज की तरह झिड़क दिया— ‘परे हट! अब तू बड़ा हो गया है.’ और वे काम में लग गईं. मैं उनसे कहना चाहता था कि मैं अभी उतना बड़ा नहीं हुआ हूं. जितना वे समझती हैं. बस इतना बड़ा हुआ […]

Continue reading
डॉ. हरिकृष्ण  देवसरे के बालउपन्यास

डॉ. हरिकृष्ण देवसरे के बालउपन्यास

हिंदी बालसाहित्‍य पर पहला शोधप्रबंध, प्रथम पांक्‍तेय संपादक, प्रथम पांक्‍तेय आलोचक तथा प्रथम पांक्‍तेय रचनाकार. बालसाहित्‍यकार कहलवाने में जरा-भी हिचकिचाहट नहीं. जब और जहां भी अवसर मिले बालसाहित्‍य में नई परंपरा की खोज के लिए सतत आग्रहशील. पचास से अधिक वर्षों से अबाध मौलिक लेखन. कई दर्जन पुस्‍तकें. उत्‍कृष्‍ट पत्रकारिता. संपादन, समालोचना और अनुवादकर्म. कुल […]

Continue reading
परीकथाएं और विज्ञानगल्प

परीकथाएं और विज्ञानगल्प

हिंदी बालसाहित्य में परीकथा संभवतः अकेला ऐसा विषय है, जिसे लेकर लंबी-लंबी बहसें चली हैं. बालसाहित्य मर्मज्ञ विद्वानों का एक वर्ग परीकथाओं को उच्च मानवीय गुणों एवं नैतिकता के अजस्र स्रोत के रूप में देखता है. वह संवेदना, सदगुण, सकारात्मक द्रष्टिकोण, तार्किकता और नए जीवनमूल्यों के अनुरूप लिखी गईं परीकथाओं का बालसाहित्य के रूप में […]

Continue reading
नन्हा दीपक

नन्हा दीपक

दुनिया में जितनी बुराइयां हैं, उससे कहीं ज्यादा अच्छाइयां हैं. हम अच्छाइयों को रोज देखते हैं, किंतु नजरंदाज कर जाते हैं. शायद इसलिए कि अच्छाइयां बुराइयों की भांति हमें चौंकाती नहीं. केवल जीवन में भरोसा दिलाती हैं. मन में भरोसा हो तो आदमी को सबकुछ भरा-भरा लगने लगता है. बुराइयां चौंकाकर हमारी चेतना का बड़ा […]

Continue reading
सुखद संयोगों के साथ….

सुखद संयोगों के साथ….

किशोर उपन्यास ’मिश्री का पहाड़’ की भूमिका का अंश हर बालक अपने आप में एक्टीविस्ट होता है. पुराने को भंग कर नए की स्थापना को उत्सुक. आप उसे खिलौना दीजिए. कुछ देर खेलेगा, उसके बाहर-भीतर झांकने-समझने की कोशिश करेगा. तोड़ने का मन हुआ तो पल गंवाए बिना वैसा प्रयास भी करेगा. खिलौना महंगा है, पैसा […]

Continue reading